कुल मिलाकर देखा जाए तो राजनाथ सिंह भाजपा के उन नेताओं में अलग खड़े दिखते हैं जिनकी भगवाधारी पहचान नहीं है.
बीते कुछ सालों में भगवा ताक़तों और मुसलमान समाज के बीच खाई बढ़ती हुई देखी गई है लेकिन राजनाथ सिंह इस खाई के बीच भी किसी पुल की तरह प्रतीत होते हैं, जोकि मुसलमान समाज के भी क़रीब हैं.
इस तरह से देखें तो छह मई को होने वाले चुनाव में राजनाथ सिंह लखनऊ से एक मज़बूत उम्मीदवार के तौर पर नज़र आते हैं जिनका सभी तबक़ों में जनाधार दिखता है.
भले ही गठबंधन की ओर से समाजवादी पार्टी ने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को लखनऊ से उतारा हो और कांग्रेस ने एक और ग़ैर-राजनीतिक चेहरे प्रमोद कृष्णन को टिकट थमाया हो, लेकिन राजनाथ के लिए ये कोई बहुत बड़ी चुनौती पेश करते नहीं दिखते.
इसके बावजूद राजनाथ सिंह अपनी पार्टी की छवि से बाहर निकलते हुए मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, ठीक अटल बिहारी वाजपेयी की तरह जो कई सालों तक लखनऊ के लोगों के चहेते बने रहे.
मुश्किल हालात को आसान बनाने की राजनाथ सिंह की क्षमता पहली बार साल 1998 में देखने को मिली थी जब उन्होंने कल्याण सिंह की सरकार बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
उस समय बसपा प्रमुख मायावती ने कल्याण सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. तब राजनाथ सिंह ने अपने निजी संबंधों के आधार पर एक प्राइवेट एयरलाइन के ज़रिए कल्याण सिंह के समर्थन में तमाम विधायक जुटाए और अगली सुबह राष्ट्रपति के सामने बहुमत साबित कर दिखाया.
उस एयरलाइन ने पहले से तय कमर्शियल फ़्लाइट को रद्द कर राजनाथ सिंह की मांग को तरजीह दी थी.
इसी तरह जब कल्याण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच मुश्किल हालात पैदा हुए तो राजनाथ सिंह ने बिना एक भी शब्द कहे अटल बिहारी का पक्ष अपनाया.
यहां तक कि मीडिया ने उनसे कई तरह के मुश्किल सवाल किए लेकिन राजनाथ ने सिर्फ़ एक मुस्कान के ज़रिए सभी मुश्किलों को टाल दिया.
इसमें कोई शक नहीं कि अटल बिहारी के दौर के बाद अब राजनाथ के भीतर ही वह कला बाक़ी रह गई है जहां वे उन लोगों के भी क़रीब रहने का हुनर जानते हैं जो उनसे विचारधारा से मेल नहीं खाते हों.
साल 2014 के आम चुनाव के दौरान राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे और उन्होंने उस समय एनडीए गठबंधन को एकजुट बनाए रखा था.
कुछ-कुछ इसी तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1998 से लेकर साल 2004 तक एनडीए को टूटने नहीं दिया.
वाजपेयी के राजनीति से विदा लेने के दस साल बाद भाजपा को किसी ऐसे शख़्स की तलाश थी जो एक बार फिर एनडीए गठबंधन को एकसाथ ला सके.
ऐसे में राजनाथ सिंह ने वह काम किया और एक समान विचार रखने वाले दलों को साथ लेकर आए. भाजपा के नेतृत्व में 30 से अधिक राजनीतिक दल गठबंधन का हिस्सा बने और इस सब का श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनाथ सिंह को जाता है.
यह ज़रूर कहा जा सकता है कि इस गठबंधन की आधारशिला एक दशक पहले राजनाथ सिंह के राजनीतिक गुरु अटल बिहारी वाजपेयी ने रख दी थी. यही वजह है कि आज राजनाथ सिंह को दूसरे अटल के तौर पर देखा जा रहा है.
बीते कुछ सालों में भगवा ताक़तों और मुसलमान समाज के बीच खाई बढ़ती हुई देखी गई है लेकिन राजनाथ सिंह इस खाई के बीच भी किसी पुल की तरह प्रतीत होते हैं, जोकि मुसलमान समाज के भी क़रीब हैं.
इस तरह से देखें तो छह मई को होने वाले चुनाव में राजनाथ सिंह लखनऊ से एक मज़बूत उम्मीदवार के तौर पर नज़र आते हैं जिनका सभी तबक़ों में जनाधार दिखता है.
भले ही गठबंधन की ओर से समाजवादी पार्टी ने फ़िल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को लखनऊ से उतारा हो और कांग्रेस ने एक और ग़ैर-राजनीतिक चेहरे प्रमोद कृष्णन को टिकट थमाया हो, लेकिन राजनाथ के लिए ये कोई बहुत बड़ी चुनौती पेश करते नहीं दिखते.
इसके बावजूद राजनाथ सिंह अपनी पार्टी की छवि से बाहर निकलते हुए मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, ठीक अटल बिहारी वाजपेयी की तरह जो कई सालों तक लखनऊ के लोगों के चहेते बने रहे.
मुश्किल हालात को आसान बनाने की राजनाथ सिंह की क्षमता पहली बार साल 1998 में देखने को मिली थी जब उन्होंने कल्याण सिंह की सरकार बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
उस समय बसपा प्रमुख मायावती ने कल्याण सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था. तब राजनाथ सिंह ने अपने निजी संबंधों के आधार पर एक प्राइवेट एयरलाइन के ज़रिए कल्याण सिंह के समर्थन में तमाम विधायक जुटाए और अगली सुबह राष्ट्रपति के सामने बहुमत साबित कर दिखाया.
उस एयरलाइन ने पहले से तय कमर्शियल फ़्लाइट को रद्द कर राजनाथ सिंह की मांग को तरजीह दी थी.
इसी तरह जब कल्याण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच मुश्किल हालात पैदा हुए तो राजनाथ सिंह ने बिना एक भी शब्द कहे अटल बिहारी का पक्ष अपनाया.
यहां तक कि मीडिया ने उनसे कई तरह के मुश्किल सवाल किए लेकिन राजनाथ ने सिर्फ़ एक मुस्कान के ज़रिए सभी मुश्किलों को टाल दिया.
इसमें कोई शक नहीं कि अटल बिहारी के दौर के बाद अब राजनाथ के भीतर ही वह कला बाक़ी रह गई है जहां वे उन लोगों के भी क़रीब रहने का हुनर जानते हैं जो उनसे विचारधारा से मेल नहीं खाते हों.
साल 2014 के आम चुनाव के दौरान राजनाथ सिंह पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे थे और उन्होंने उस समय एनडीए गठबंधन को एकजुट बनाए रखा था.
कुछ-कुछ इसी तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1998 से लेकर साल 2004 तक एनडीए को टूटने नहीं दिया.
वाजपेयी के राजनीति से विदा लेने के दस साल बाद भाजपा को किसी ऐसे शख़्स की तलाश थी जो एक बार फिर एनडीए गठबंधन को एकसाथ ला सके.
ऐसे में राजनाथ सिंह ने वह काम किया और एक समान विचार रखने वाले दलों को साथ लेकर आए. भाजपा के नेतृत्व में 30 से अधिक राजनीतिक दल गठबंधन का हिस्सा बने और इस सब का श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ राजनाथ सिंह को जाता है.
यह ज़रूर कहा जा सकता है कि इस गठबंधन की आधारशिला एक दशक पहले राजनाथ सिंह के राजनीतिक गुरु अटल बिहारी वाजपेयी ने रख दी थी. यही वजह है कि आज राजनाथ सिंह को दूसरे अटल के तौर पर देखा जा रहा है.